
खंड 37
अमूल ने किसानों को पूरी कड़ी का मालिक कैसे बनाया
हज़ारों छोटे दूध उत्पादक बिचौलिये को मुनाफ़ा दिए बिना सही दाम कैसे पाएँ?
- केस
- सफलता
- वर्ष
- 1946-2025
- ₹65,911 करोड़
- GCMMF का कारोबार · 2024-25
- 36 लाख
- किसान सदस्य · 2025
- लगभग 300 लाख लीटर
- रोज़ाना दूध संग्रह · 2025
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हालात
1940 के दशक में गुजरात के खेड़ा (कैरा) ज़िले के दूध उत्पादक निजी ठेकेदारों के ज़रिये दूध बेचते थे और दाम पर उनका कोई ज़ोर नहीं था। जून 1946 में सिर्फ़ दो गाँव-स्तरीय दुग्ध सहकारी समितियों से यह आंदोलन शुरू हुआ। दिसंबर 1946 में ज़िला संघ, जो आगे चलकर AMUL कहलाया, पाँच गाँव समितियों को सदस्य बनाकर पंजीकृत हुआ।
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फ़ैसला
किसानों ने तीन-स्तरीय ढाँचा बनाया, जिसे NDDB आज 'आणंद पैटर्न' कहता है। गाँव की समिति अपने सदस्यों से बचा हुआ दूध इकट्ठा करती है। गाँव समितियों के स्वामित्व वाला ज़िला संघ दूध का संग्रह, प्रसंस्करण और बिक्री सँभालता है और सदस्यों को पशु-आहार, पशु-चिकित्सा और नस्ल-सुधार की सेवाएँ देता है। ज़िला संघों से बना राज्य महासंघ एक ही ब्रांड के तहत उत्पादों की मार्केटिंग करता है और उत्पादन की योजना बनाता है।
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नतीजा
यह मॉडल पूरे देश में फैला। 2024-25 में गुजरात के महासंघ GCMMF ने 65,911 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया, जो 11 प्रतिशत अधिक था। इसके 18 सदस्य संघ गुजरात के 18,600 गाँवों के 36 लाख किसानों से रोज़ लगभग 300 लाख लीटर दूध इकट्ठा करते हैं।