
खंड 37
फ़ेविकोल ने पहले बढ़इयों को बेचकर बाज़ार कैसे जीता
पीढ़ियों से इस्तेमाल हो रहे उत्पाद को छोड़कर कारीगर आपका उत्पाद कैसे अपनाएँ?
- केस
- सफलता
- वर्ष
- 1959-2004
- 75,000+
- नेटवर्क में डीलर · 2026
- 1,20,000+
- नेटवर्क में ठेकेदार · 2026
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हालात
1950 के दशक में भारतीय बढ़ई जानवरों से बनी गोंद इस्तेमाल करते थे, जिसे लगाने से पहले गरम करना पड़ता था। 1954 में कपड़ा छपाई के लिए पिगमेंट इमल्शन बनाने से शुरुआत करने वाले बलवंत पारेख और उनके भाई सुशील ने 1959 में इसका सिंथेटिक विकल्प बनाया और उसका नाम फ़ेविकोल रखा।
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फ़ैसला
उस समय के चलन की तरह दुकानों के ज़रिये बेचने के बजाय कंपनी ने फ़ेविकोल का प्रचार सीधे बढ़इयों में किया, क्योंकि गोंद वही चुनते थे। 1963 में मुंबई के कोंडिविटा में पहला कारख़ाना खुला, और 1970 में ठेकेदारों के लिए अलग-अलग पैक और उपभोक्ताओं के लिए 30 ग्राम की ट्यूब आई।
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नतीजा
फ़ेविकोल भारत में सफ़ेद गोंद का दूसरा नाम बन गया। इसका पहला टीवी विज्ञापन 1997 में आया, यानी बढ़इयों का नेटवर्क बनने के दशकों बाद, और 2004 में जलरोधी 'फ़ेविकोल मरीन' जोड़ा गया। कंपनी की वेबसाइट 75,000 से अधिक डीलरों और 1,20,000 से अधिक ठेकेदारों का नेटवर्क बताती है।