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खंड 37

मुंबई के डब्बावाले बिना तकनीक के डिलीवरी कैसे करते हैं

कम लागत वाली टीम बिना कंप्यूटर के रोज़ लाखों चीज़ें समय पर कैसे पहुँचाए?

केस
सफलता
वर्ष
2010-2014
2,50,000 तक
रोज़ाना पहुँचाए जाने वाले डिब्बे · 2014
  1. 01

    हालात

    हर कामकाजी दिन मुंबई के डब्बावाले घरों से बना खाना उठाकर शहर भर के दफ़्तरों तक पहुँचाते हैं और फिर ख़ाली डिब्बे वापस लाते हैं। द वर्ल्ड (PRI) ने 2014 में बताया कि वे रोज़ 2,50,000 तक डिब्बे पहुँचाते हैं, और डिब्बों पर बहुत कम लिखा होता है।

  2. 02

    फ़ैसला

    महँगी तकनीक अपनाने के बजाय यह व्यवस्था डिब्बों पर सरल कोड, तय रास्तों और लोकल ट्रेन की समय-सारिणी पर चलती है। इसका अध्ययन करने वाले हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल के प्रोफ़ेसर स्टेफ़न थॉमके ने कहा कि रेलगाड़ी पूरे संगठन को एक लय में चलने पर मजबूर करती है। हार्वर्ड केस इस व्यवस्था को कम लागत और सरल संचालन के साथ बहुत ऊँचे सेवा-स्तर (सिक्स सिग्मा के बराबर या बेहतर) वाला बताता है।

  3. 03

    नतीजा

    डब्बावाला व्यवस्था हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल का केस (9-610-059) बनी, जिसे संचालन प्रबंधन पढ़ाने में इस्तेमाल किया जाता है। थॉमके ने द वर्ल्ड से कहा कि डब्बावाले शायद ही कभी ग़लती करते हैं और उनका राज़ तकनीक नहीं, बल्कि व्यवस्था है।

स्रोत (2)
  1. What Harvard learned studying India's lunch box delivery system · 2014
  2. The Dabbawala System: On-Time Delivery, Every Time (HBS Case 9-610-059)

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