
खंड 37
तनिष्क ने कैरेटमीटर से भरोसा कैसे जीता
जिस बाज़ार में पारिवारिक भरोसा चलता हो, वहाँ नया ब्रांड ग्राहक कैसे जीते?
- केस
- वापसी
- वर्ष
- 1996-2002
- 1997
- कैरेटमीटर की शुरुआत · 1997
- 2002
- गोल्डन हार्वेस्ट बचत योजना की शुरुआत · 2002
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हालात
टाइटन ने तनिष्क के साथ आभूषण के ऐसे बाज़ार में क़दम रखा जो ज़्यादातर असंगठित था और जहाँ दाम व गुणवत्ता में पारदर्शिता कम थी। शुरुआत में 18 कैरेट सोने पर ज़ोर भारतीय ख़रीदारों की 22 कैरेट वाली पसंद से मेल नहीं खाया, और शुरुआती वर्षों में ब्रांड घाटे में रहा।
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फ़ैसला
तनिष्क ने ग्राहकों की पसंद वाली शुद्धता अपनाई और शुद्धता को जाँचने लायक़ बना दिया। टाइटन की अपनी समय-रेखा के अनुसार 1997 में तनिष्क ने कैरेटमीटर शुरू किया, जिससे ग्राहक दुकान में ही बिना गहने को नुक़सान पहुँचाए सोने की शुद्धता जाँच सकते थे। 1998 में 'थीफ़ इन द फ़ैमिली' अभियान ने पारिवारिक सुनारों पर आँख मूँदकर भरोसे पर सवाल उठाया, और 2002 में गहनों के लिए मासिक बचत वाली 'गोल्डन हार्वेस्ट' योजना शुरू हुई।
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नतीजा
कैरेटमीटर ने शुद्धता के वादे को ऐसे सबूत में बदल दिया जिसे ग्राहक ख़ुद देख सके, और इसे वह मोड़ माना जाता है जिससे तनिष्क की बाज़ार हिस्सेदारी बढ़ी। आगे तनिष्क ने ज़ोया (2009) और मिया (2011) जैसे उप-ब्रांड शुरू किए और 2023 में अमेरिका में दुकानें खोलीं।