
खंड 36
लिज्जत पापड़ की सात संस्थापिकाएँ (जसवंतीबेन जमनादास पोपट और छह अन्य)
Shri Mahila Griha Udyog Lijjat Papad · गिरगाँव, मुंबई
- ₹80
- शुरुआत की उधार पूँजी · 1959
- लगभग 45,000
- सदस्य बहनें · 2026
- क़रीब $100 मिलियन
- सालाना कारोबार · 2009
कहानी
15 मार्च 1959 को मुंबई के गिरगाँव की एक पुरानी इमारत की छत पर सात गुजराती गृहिणियाँ जमा हुईं और पापड़ के चार पैकेट बेले। वे कम पढ़ी-लिखी थीं और परिवार की मदद के लिए थोड़ा कमाना चाहती थीं। उनके पास पैसे नहीं थे; उन्होंने समाजसेवी छगनलाल करमसी पारेख से ₹80 उधार लेकर शुरुआत की।
पारेख ने सलाह दी कि कभी दान न लें। उन्होंने यही नियम अपनाया: संस्था कहती है कि उसने कभी दान, उपहार या अनुदान नहीं लिया और काम व्यावसायिक ढंग से चलता है। शुरुआत के तीन महीने बाद 25 महिलाएँ जुड़ चुकी थीं। 1966 में संस्था पंजीकृत हुई और उसे खादी और ग्रामोद्योग आयोग की मान्यता मिली।
लिज्जत को इसकी सदस्य बहनें ही चलाती हैं। हर शाखा का लाभ या घाटा उसकी सदस्य बहनें आपस में बाँटती हैं। 2009 में 50वें साल तक बीबीसी ने इसका कारोबार लगभग 10 करोड़ डॉलर बताया। आज संस्था के अनुसार 16 राज्यों में उसकी 83 शाखाएँ और 31 प्रभाग हैं और लगभग 45,000 महिलाओं को स्वरोज़गार मिलता है। 2009 में बीबीसी से मिलते समय जसवंतीबेन जमनादास पोपट अकेली जीवित संस्थापिका थीं।
समय-रेखा
- 195915 मार्च को सात महिलाओं ने उधार के ₹80 से शुरुआत की; पहले दिन चार पैकेट पापड़ बने।
- 1959तीन महीने बाद 25 महिलाएँ जुड़ चुकी थीं।
- 1966संस्था पंजीकृत हुई और खादी और ग्रामोद्योग आयोग की मान्यता मिली।
- 2002इकोनॉमिक टाइम्स का कॉर्पोरेट उत्कृष्टता पुरस्कार मिला।
- 200950 साल पूरे; लगभग 10 करोड़ डॉलर का कारोबार बताया गया।