01 लागत के दो प्रकार
स्थायी खर्च हर महीने एक जैसे रहते हैं, बिक्री कम हो या ज़्यादा: किराया, स्थायी कर्मचारियों का वेतन, कर्ज़ का ब्याज, बीमा, सॉफ़्टवेयर की फ़ीस।
बदलती लागत हर बने या बिके नग के साथ घटती-बढ़ती है: कच्चा माल, पैकिंग, नग के हिसाब से मज़दूरी, डिलीवरी का ईंधन, बिक्री का कमीशन, ऑनलाइन भुगतान का शुल्क।
कुछ खर्च मिले-जुले होते हैं। बिजली में अक्सर एक तय मासिक शुल्क और इस्तेमाल की गई यूनिट पर अलग शुल्क होता है। ऐसे खर्च को दोनों हिस्सों में बाँटिए।
- स्थायी: किराया, वेतन, ब्याज, बीमा, लाइसेंस फ़ीस।
- बदलती: कच्चा माल, पैकिंग, नग के हिसाब से मज़दूरी, डिलीवरी ईंधन, कमीशन।
- मिली-जुली: बिजली, फ़ोन, गाड़ी चलाने का खर्च।
02 ज़्यादा माल से प्रति नग लागत क्यों घटती है
स्थायी खर्च सारे नगों में बँटता है। जितना ज़्यादा उत्पादन, हर नग का हिस्सा उतना छोटा। इसीलिए खाली खड़ी मशीन इतनी महँगी पड़ती है।
उदाहरण (काल्पनिक आँकड़े, असली डेटा नहीं): एक छोटी आटा चक्की का स्थायी खर्च ₹40,000 महीना है और बदलती लागत ₹2 प्रति किलो। 10,000 किलो महीने पर प्रति किलो लागत = ₹2 + ₹4 = ₹6। 20,000 किलो पर प्रति किलो लागत = ₹2 + ₹2 = ₹4। वही चक्की, वही कर्मचारी, प्रति किलो लागत एक-तिहाई कम।
03 स्थायी खर्च फ़ायदा और जोखिम दोनों बढ़ाते हैं
जिस व्यापार में स्थायी खर्च ज़्यादा है, वह ब्रेक-ईवन पार करने के बाद ख़ूब कमाता है, पर ख़राब महीने में भारी घाटा उठाता है। जिसमें ज़्यादातर बदलती लागत है, वह प्रति नग कम कमाता है पर सुस्त महीने झेल लेता है।
शुरुआत में स्थायी खर्च कम रखिए: शेड बनाने से पहले किराये पर लीजिए, हर मशीन ख़रीदने से पहले जॉब-वर्क करवाइए, और बिक्री स्थिर होने तक नग के हिसाब से काम करवाइए।
