01 मुनाफ़ा और नकदी अलग-अलग समय पर आते-जाते हैं
बिक्री होते ही मुनाफ़ा बन जाता है, पर नकदी तभी मिलती है जब ग्राहक सच में पैसा देता है। अगर ग्राहक 60 दिन बाद भुगतान करते हैं, तो आपका मुनाफ़ा असली है पर नकदी 60 दिन तक उनके पास फँसी है।
इस बीच किराया, मज़दूरी, बिजली और सप्लायर को अभी पैसा चाहिए। ज़्यादातर छोटे व्यापार इसी अंतर में फँसते हैं।
उदाहरण (काल्पनिक आँकड़े, असली डेटा नहीं): एक व्यापारी अप्रैल में ₹2,00,000 नकद देकर माल ख़रीदता है और दुकानों को ₹2,50,000 में बेचता है, भुगतान 60 दिन बाद। काग़ज़ पर मुनाफ़ा ₹50,000 है। पर अप्रैल और मई में उसके खाते में ₹2,00,000 कम हैं, और हर महीने ₹15,000 किराया और ₹20,000 मज़दूरी देनी है। अगर इन दो महीनों के लिए उसके पास ₹70,000 अलग नहीं रखे हैं, तो मुनाफ़े में होते हुए भी उसके पास नकदी कम पड़ेगी।
02 वे चीज़ें जो नकदी खाती हैं पर खर्च में नहीं दिखतीं
कई भुगतान आपकी नकदी घटाते हैं पर मुनाफ़ा नहीं घटाते। इन पर ख़ास नज़र रखिए।
- कर्ज़ की मूल रक़म की किस्तें (सिर्फ़ ब्याज खर्च माना जाता है)।
- मशीन या गाड़ी ख़रीदना (इसकी लागत कई साल में घिसावट के रूप में बँटती है)।
- गोदाम में पड़ा माल।
- ग्राहकों को दिया उधार।
- ग्राहक से पैसा आने से पहले भरा गया टैक्स।
- घर ख़र्च के लिए निकाला गया पैसा।
03 तेज़ बढ़त सबसे ख़तरनाक समय हो सकता है
बड़ा नया ऑर्डर अच्छी ख़बर लगता है। पर ख़रीदार के पैसा देने से पहले आपको माल ख़रीदना और मज़दूरों को पैसा देना होता है। ऑर्डर जितना बड़ा, पहले से उतनी ज़्यादा नकदी चाहिए।
बड़ा ऑर्डर लेने से पहले लिखिए कि हर रुपया कब जाएगा और कब आएगा। अगर अंतर बहुत ज़्यादा है, तो अग्रिम भुगतान माँगिए, भुगतान की छोटी अवधि तय कीजिए, या पहले कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) का इंतज़ाम कीजिए।
04 नकदी की एक आसान योजना रखिए
13 खानों वाली एक तालिका बनाइए: यह हफ़्ता और अगले 12 हफ़्ते। हर खाने में लिखिए कितनी नकदी आने की उम्मीद है और कितनी देनी है। आख़िरी पंक्ति हर हफ़्ते बचने वाली रक़म दिखाती है।
जिस हफ़्ते रक़म शून्य से नीचे जाए, वह एक चेतावनी है जिस पर आप अभी कदम उठा सकते हैं, बाद में अचानक झटका नहीं लगेगा।
