कहानी
नरसापुर में क्रोशिया लेस उन्नीसवीं सदी में ईसाई मिशनरियों ने महिलाओं के घर बैठे काम के रूप में शुरू की। यह यूरोप और अमेरिका को बिकने वाला निर्यात शिल्प बन गया, जिसमें निर्यातक महिलाओं को धागा देते हैं और वे घर पर क्रोशिया करती हैं। नरसापुर और पालकोल्लु के आसपास के गाँवों की हज़ारों महिलाएँ अंशकालिक रूप से लेस बनाती हैं। नरसापुर क्रोशिया लेस को जीआई टैग मिला है।
आँकड़ों में
नरसापुर क्रोशिया लेस क्लस्टर में 50 स्वयं सहायता समूह इकाइयाँ, लगभग 2,00,000 कामगार और ₹50 करोड़ (500 मिलियन रुपये) का कारोबार था (2010-11 के आँकड़े)।
Brief Industrial Profile of West Godavari District (MSME-DI Hyderabad, DC-MSME) · 2011
GI टैग
- Narasapur Crochet Laceआवेदन संख्या GI application no. 713Registration details of Geographical Indications (IP India GI Registry)
नए उद्यमी के लिए रास्ते
- ऑनलाइन ख़रीदारों के लिए नए लेस उत्पाद डिज़ाइन करें
- लेस की रंगाई और ब्लीचिंग सेवा
- ब्रांडिंग और सीधा निर्यात
- स्वयं सहायता समूहों को थोक में धागा सप्लाई
क्लस्टर की मुश्किलें
- पुराने डिज़ाइन और कमज़ोर गुणवत्ता नियंत्रण
- रंगाई और ब्लीचिंग की सुविधा नहीं
- कमज़ोर संगठन और ब्रांडिंग
- महिलाओं को प्रति नग बहुत कम दाम
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