कहानी
मालेगाँव की बुनाई परंपरा अंसारी बुनकर परिवारों ने बनाई, जिनमें से कई 1800 के दशक में उत्तर भारत से आए और बाद में हथकरघे से पावरलूम पर आ गए। शहर मुंबई–आगरा हाईवे पर है, इसलिए धागा मुंबई से आता है और ग्रे कपड़ा व्यापारियों और प्रोसेस हाउस को जाता है। ज़्यादातर इकाइयाँ छोटे पारिवारिक शेड हैं, जहाँ सादे करघे जॉब-वर्क पर चलते हैं।
आँकड़ों में
मालेगाँव को 'पावरलूम का शहर' कहा जाता है; यहाँ लगभग एक लाख करघे हैं और पूरी क्षमता पर शहर सालाना 80 लाख मीटर ग्रे कपड़ा बनाता है (वस्त्र आयुक्त कार्यालय की बिना तारीख़ वाली परियोजना रिपोर्ट)।
Project report on modernisation of M/s Ansari Ltd., Malegaon – Office of the Textile Commissionerमालेगाँव में 75 साइज़िंग इकाइयाँ और दो प्रोसेस हाउस हैं; कपड़ा उद्योग में लगभग 2.5 लाख मज़दूर लगे हैं (उसी रिपोर्ट के अनुसार)।
Project report on modernisation of M/s Ansari Ltd., Malegaon – Office of the Textile Commissionerपावरटेक्स इंडिया योजना के तहत मालेगाँव क्लस्टर की पावरलूम इकाइयों को ₹12.28 करोड़ जारी हुए; मालेगाँव में एक ITADC है।
PIB – Schemes for modernization of powerloom industry (Rajya Sabha reply, 6 Feb 2026) · 2026
नए उद्यमी के लिए रास्ते
- बेहतर कपड़े और ऊँचे दाम के लिए रेपियर या एयर-जेट करघे लगाना
- साइज़िंग, वार्पिंग और धागा आपूर्ति सेवाएँ
- सिर्फ़ ग्रे कपड़े की जगह तैयार कपड़ा सीधे गारमेंट इकाइयों को बेचना
- करघों की मरम्मत और पुर्ज़ों की दुकान
क्लस्टर की मुश्किलें
- पुराने सादे करघे और कम मज़दूरी
- नक़द पर चलने वाला व्यापार; औपचारिक कर्ज़ कम
- बिजली कटौती और बिजली का ख़र्च
- धागे और ऑर्डर के लिए मुंबई के व्यापारियों पर निर्भरता
यहाँ शुरू करने लायक बिज़नेस
चादर बुनाई इकाई (पावरलूम) →सूती धागे की रंगाई (लच्छी और पैकेज रंगाई) →कपड़ा छपाई (स्क्रीन प्रिंटिंग) →कपड़े के मेड-अप्स (नैपकिन, मैट, एप्रन) →साड़ी रंगाई और छपाई →रेडीमेड कपड़ा इकाई (बच्चों के रोम्पर) →
