कहानी
पैठणी साड़ी का नाम गोदावरी किनारे बसे पैठण से आया है, जो सातवाहन काल से बुनाई का केंद्र रहा और जिसे पेशवाओं का संरक्षण मिला। बाद में बुनकर परिवार नासिक ज़िले के येवला आ गए, जहाँ आज ज़्यादातर पैठणी बनती हैं। हर साड़ी रेशम और असली या नक़ली ज़री से हाथ से बुनी जाती है, जिसके बॉर्डर और पल्लू पर मोर, कमल और तोते के मोटिफ़ होते हैं, और इसे पूरा होने में हफ़्ते लग सकते हैं।
आँकड़ों में
पैठणी क्लस्टर, येवला में 3,000 करघों वाली 725 सूक्ष्म इकाइयाँ (250 पंजीकृत), लगभग ₹70 करोड़ का कारोबार (2010-11), 3,000 प्रत्यक्ष और 7,500 अप्रत्यक्ष रोज़गार था।
Brief Industrial Profile of Nashik District, MSME-DI (Ministry of MSME) · 2012पैठणी साड़ी और कपड़ा पंजीकृत GI है (आवेदन संख्या 150, प्रमाणपत्र संख्या 130, दिनांक 03-09-2010); 'पैठण की पैठणी' का आवेदन इसी में मिला दिया गया।
GI Registry (IP India) – Application No. 150, Paithani Saree & Fabrics · 2010
GI टैग
- Paithani Saree & Fabricsआवेदन संख्या GI Application No. 150, Certificate No. 130 (03-09-2010)GI Registry (IP India) – Application No. 150, Paithani Saree & Fabrics
नए उद्यमी के लिए रास्ते
- GI टैग वाली पैठणी की ऑनलाइन और प्रदर्शनी में सीधी बिक्री
- रेशमी धागे की स्थानीय रंगाई और ऐंठन (अभी बाहर से आता है)
- जैकार्ड डिज़ाइन और कार्ड पंचिंग सेवाएँ
- पर्यटकों के लिए पैठणी मोटिफ़ वाले स्टोल, बैग, कुशन कवर
क्लस्टर की मुश्किलें
- पावरलूम पर बनी नक़ली 'पैठणी' कम दाम पर बिकती है
- रेशम और ज़री का ऊँचा ख़र्च
- युवा बुनकर यह काम छोड़ रहे हैं
- स्थानीय रेशम रीलिंग, ऐंठन या रंगाई की सुविधा नहीं (क्लस्टर रिपोर्ट)
यहाँ शुरू करने लायक बिज़नेस
ज़री और सिल्क कढ़ाई →हथकरघा और हस्तशिल्प की दुकान →साड़ी रोलिंग और पॉलिशिंग →
