कहानी
मामल्लपुरम के चट्टान काटकर बने मंदिर और उभरी नक्काशी सातवीं-आठवीं सदी में पल्लव राजाओं के समय बनीं। कस्बे में बसे पत्थर-कारीगर इस परंपरा को ज़िंदा रखते हैं और भारत व विदेश के मंदिरों के लिए ग्रेनाइट और दूसरे कठोर पत्थरों की मूर्तियाँ, साथ ही बग़ीचे और सजावट के सामान बनाते हैं। कस्बे का सरकारी स्थापत्य और मूर्तिकला महाविद्यालय युवा स्थपतियों को प्रशिक्षण देता है। पूम्पुहार के ज़रिए इस शिल्प को GI टैग मिला।
आँकड़ों में
महाबलीपुरम स्टोन स्कल्पचर पंजीकृत GI है (आवेदन 426, प्रमाणपत्र 302)।
GI Registry — Mahabalipuram Stone Sculpture, application 426
GI टैग
- Mahabalipuram Stone Sculptureआवेदन संख्या GI Application No. 426 (Certificate No. 302)GI Registry, Intellectual Property India — application 426
नए उद्यमी के लिए रास्ते
- मंदिर और बग़ीचे की मूर्तियों के ऑर्डर, विदेशी मंदिरों सहित
- होटलों और लैंडस्केपिंग कंपनियों के लिए पत्थर की सजावट
- मूर्तिकारों के लिए निर्यात पैकिंग और शिपिंग सेवा
- पर्यटकों के लिए मूर्तिकला कार्यशालाएँ
क्लस्टर की मुश्किलें
- दूसरे राज्यों की मशीन से कटी मूर्तियाँ
- पत्थर की आपूर्ति और खदान नियम
- धूल से स्वास्थ्य जोखिम
- निर्यात के लिए भारी भाड़ा
यहाँ शुरू करने लायक बिज़नेस
गौरा पत्थर हस्तशिल्प →ग्रेनाइट टाइल कटिंग और पॉलिशिंग इकाई →
