कहानी
होशियारपुर की जड़ाई कला लगभग 250 साल पहले शुरू हुई, जब कारीगर शीशम की लकड़ी में हाथी-दाँत के नमूने जड़ते थे। यह सामान दूर-दूर तक, लंदन तक बिकता था। हाथी-दाँत पर रोक के बाद कारीगर ऊँट की हड्डी, धातु और ऐक्रेलिक इस्तेमाल करने लगे, और शीशम महँगी होने से कला सिकुड़ गई। कारीगर ज़्यादातर बस्सी ग़ुलाम हुसैन और बूथगढ़ गाँवों से हैं, और दब्बी बाज़ार मुख्य बाज़ार है।
आँकड़ों में
कभी 1,500 से ज़्यादा कारीगर यह काम करते थे, अब 100 से कम रह गए हैं; इस कला से होशियारपुर के सात राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और एक शिल्पगुरु निकले हैं।
The Tribune — Wooden inlay artwork on decline
नए उद्यमी के लिए रास्ते
- शहरी ग्राहकों को जड़ाई वाले डिब्बे और सजावटी सामान ऑनलाइन बेचना
- जड़ाई वाले आधुनिक फ़र्नीचर के लिए डिज़ाइनरों के साथ काम
- युवा कारीगरों को शागिर्द के रूप में सिखाना
- कंपनियों के उपहार ऑर्डर
क्लस्टर की मुश्किलें
- कारीगरों की संख्या बहुत घट गई
- शीशम लकड़ी की लागत और व्यापार पर रोक
- मशीन से बनी सस्ती नकल
- कारीगरों की कम कमाई
यहाँ शुरू करने लायक बिज़नेस
तारकशी हस्तशिल्प (लकड़ी में तार जड़ाई) →लकड़ी का फ़र्नीचर बनाना →लकड़ी नक्काशी इकाई (फ़ोटो फ़्रेम) →हथकरघा और हस्तशिल्प की दुकान →
