कहानी
माचिस बनाने का काम 1920 के दशक में दक्षिण तमिलनाडु आया और शिवकाशी, सत्तूर, कोविलपट्टी और कलुगुमलै में फैला; वेल्लोर के पास गुडियात्तम दूसरा केंद्र बना। सूखी जलवायु तीलियों और डिब्बों को सुखाने के लिए ठीक है, और काम छोटी कुटीर इकाइयों में ज़्यादातर महिलाएँ करती थीं। अब मशीनी इकाइयों का हिस्सा बढ़ रहा है। छोटी इकाइयों को टिकने में मदद के लिए कई साझा सुविधा केंद्र बने।
आँकड़ों में
गुडियात्तम, कलुगुमलै, कोविलपट्टी, सत्तूर, श्रीविल्लिपुत्तूर और विरुधुनगर के सेफ़्टी माचिस क्लस्टर साझा सुविधा केंद्र MSE-CDP के तहत पूरे हुए बताए गए हैं।
Completed Common Facility Centres under MSE-CDP (as on 22 Mar 2024), Office of DC-MSME · 2024एक सांसद ने बताया कि सत्तूर, कोविलपट्टी, शिवकाशी, विरुधुनगर और श्रीविल्लिपुत्तूर की लगभग 3,500 हाथ से माचिस बनाने वाली इकाइयाँ लगभग 2 लाख लोगों को रोज़ी देती हैं।
Lok Sabha debate record on safety match industry — Digital Sansad
नए उद्यमी के लिए रास्ते
- माचिस इकाइयों को तीली, विनियर और रसायन की आपूर्ति
- पैकेजिंग और लेबल छपाई
- मशीन से डिब्बे भरने का जॉब-वर्क
- ब्रांडेड माचिस का व्यापार और वितरण
क्लस्टर की मुश्किलें
- GST दरों में बदलाव और सस्ते लाइटरों से माँग घटी
- बारिश से सुखाई रुकती है और उत्पादन बंद होता है
- मशीनों से कुटीर रोज़गार घटता है
- लकड़ी और रसायन जैसे कच्चे माल महँगे
